Beautiful Poems on Nature | Van Mahotsav | Poster | Slogan

Van Mahotsaveप्रकृति के कारण ही सब संभव है | प्रकृति, कुदरत सब ईश्वर की देन है | प्रकृति हमारी सभी जरूरतों को पूरा ख्याल रखती है।

परन्तु मनुष्य आज अपने निजी स्वार्थ के लिए प्रकृति से जमकर खिलवाड़ कर रहा है, जिसके चलते भविष्य में संकट गहरा सकता है।

प्रकृति पर आधारित  नीरज बंसल किताब के कुछ अंश हिन्दी कवितायेँ (Poems on Nature),  Van Mahotsav, Poster, Slogan .... आशा है की आप को यह कवितायेँ पसंद आये, कृप्या इन्हें Share, Comment और Like करें |

Van Mahotsav | Poster | Slogan

chedchad band Karo,ithlati balkhati nadio se,
jis tarah behta hai daria usse usi tarah Behne do,
ya phir anjam bhugtane ko tayar ho jayo.,
phir to jo kehti hai kudrat usse bhi kehne do.
*****
kya the hum kya hote ja rahen hai,thoda vichar karo
khud bhi manusy ho jao aur sari manvta se pyar karo
Bana diya hai is adhunikikaran ne sab ko andha
hokar vashibhut dhan dollat ke, mat prakartik sampda ko bekar karo


Van Mahotsav: आओ पेड़ लगाएं हम

मृत्यु से जीवन की ओर
दौड़ लगाएं हम
आओ पेड़ लगाएं हम
ज्यादा से ज्यादा जीवन बोने की
होड़ लगाएं हम
आओ पेड़ लगाएं हम

काटेंगे अगर हम ही जीवन को
तो सांसे डर जायेगी
नही बोयेंगे अगर हम वृक्ष
तो प्यारी प्रकृति मर जायेगी
पूरी करने को अपनी अंधी हसरतें
ना धरती माँ को कोढ़ लगाये हम
मृत्यु से जीवन की ओर
दौड़ लगाएं हम
आओ पेड़ लगाएं हम

जब तक ना लगे हजारों पेड़
हमें नही चैन से सोना है
जब रोता है रब हमारे लिये
हमें भी उसकी खातिर रोना है
कितनी फैला चुके हम हरियाली
हर रोज ये जोड़ लगाएं हम
मृत्यु से जीवन की ओर
दौड़ लगाएं हम
आओ पेड़ लगाएं हम

जहां लगे होते हैं हजारों वृक्ष
वहां खुद आकर रब बसता है
स्वस्थ, संरक्षित स्वच्छ पर्यावरण
बुरी आत्माओं को डसता है
पृथ्वी को हजारों वर्ष जीने का
कोई बहाना बेजोड़ लगाएं हम
मृत्यु से जीवन की ओर
दौड़ लगाएं हम
आओ पेड़ लगाएं हम

नीरज रतन बंसल 'पत्थर'


Poem on Nature: कुदरत

कौन सिखाता है पक्षियों के बच्चों को उडना
कौन सिखाता है जानवरों के बच्चों को चलना
ये तो सब खेल है इस निराली कुदरत के
फैंक देती है जो सांसे हवा में,

हम भी कब के मर गए होते वरना
हर चीज से जरूरी होती है सांसे
वरना हर तरफ नजर आएगी लाशें
सब चीजों को हम दे सकते है धोखा

पर कुदरत को तो दे नही सकते झांसे
अपने हाथों से कुदरत ने किया है पृथ्वी का निर्माण
हर शै को बनाकर भेजा है अपने अपने सफर का मेहमान
पहचानती है हर एक चीज की फितरत प्रकृति

रो रही अब, हाय क्यूं बनाया था मैंने इंसान
कुदरत की बनाई हर चीज का अकेला इंसान ही दुश्मन है
सबसे कपटी सबसे खतरनाक इस इंसान का मन है
लूट लेना चाहता है हर तरीके से प्रकृति के संसाधनो को

बस कुछ एक साल और बचे धरती पर चमन है
वही निकला सबसे घटिया, जिसको सबसे समझदार बनाया था
करेगा सबकी रक्षा, भगवान तो इसलिये इंसान को धरती पर लेकर आया था
नही मालूम था के एक दिन बन जाएगा विनाश का कारण यही इंसान
रो रहा है खुदा ऐसा क्यूं हुआ मैंने तो ऐसा कुछ भी नही इसे सिखाया था
आयेगी अगर कभी प्रलय तो सबसे पहले इंसान खत्म होंगे
कहीं दिखेगी नही रोशनी हर तरफ सिर्फ तम होंगे
एक भी निशान नही बचेगा मानवो का धरती पर कहीं
चारो तरफ सिर्फ और सिर्फ जंगली जानवरो के कदम होंगे

नीरज रतन बंसल 'पत्थर'


Hindi Poem on Nature: *कुदरत मां है

यह बात बिल्कुल अटल है
के बहुत मुशिकलों से भरा आने वाला कल है
कभी बरसती है आसमान से आफत
कभी जमीन करने लगती हलचल है

हर कर्म इंसानो का कुदरत को सता रहा है
मानव सोए हुए शैतानो को जाने क्यूं जगा रहा है
जैसे जैसे दूर होता जा रहा है प्रकृति से मानव
वैसे वैसे ही सर्वनाश का दिन करीब आ रहा है

कहता है सबको के कर रहा हूँ आधुनिकीकरण
हम इतने सक्षम हो चुके हैं के रोक सकते हैं जीवनमरण
पर भूल जाता उन सब हालातो को
जब मानव को कहीं भी नहीं मिलती शरण

नित नए तरीके से करता है कुदरत की छाती पर वार
बनाकर बड़ी बड़ी मशीने उसको हो चला है खुद पर अंहकार
पर क्या समझती है प्रकृति अपने रूप के आगे किसी रूप को
सब कुछ समझ जाता है मानव जब प्रकृति करती है कोई प्रहार

असल में तो हमारी औकात धरती पर एक रेत के कण से ज्यादा नहीं
सारे मानवों का कुल भारा किसी पर्वत से आधा नहीं
ये तो दुखी होकर मानवों की हरकतों से प्रकृति भी करती है हमला
वरना उसका तो इंसानो को चोट पहुँचाने का होता कोई इरादा नहीं

जिस चीज को उसने सजाया है अपने हाथों से
उसको खत्म कैसे कर सकती है
बड़ी तरसती व्याकुल नजरों से वो तो मानवों के रूखों को तकती है
ना जाने क्यूं पड़ा है मानव, खुद के घरों को उजाड़ने के पीछे
अरे प्रकृति तो होती है मां, वो कब अपने बच्चों की सेवा करती थकती है

नीरज रतन बंसल 'पत्थर'


Poem about Nature Hindi: * छेड़छाड मत करो प्रकृति से

छेड़छाड मत करो प्रकृति से
वरना प्रकृति रो देगी
और रोते-रोते एक दिन
अपने आंसुओ से सब कुछ धो देगी

स्वार्थी लोगो की मतलबी हरकतें
अपने विनाश का बीज बो देगी
अगर इसी तरह लगा रहा मनुष्य, आधुनिकता की दौड में
बस कुछ समय बाद ये धरा
लम्बे वक्त के लिये सो देगी

नही आता अगर मनुष्य
अपनी हवस इच्छाओं कामनाओं से बाज
तो ये मानव जाति
अपना आस्तित्व खो देगी

कर दिये घाव जमीं पर
अपना मतलब साधने को
किसी दिन ये प्रकति भी
अपने तरकश से कोई तीर चुभो देगी

डूब जाएंगे हम सब अंधकार में
नहीं दिखेगी कोई रोशनी जो सबको लौ देगी
खेल खेल में लुट लिया सारा सामान प्रकृति का
जिस दिन फसोंगे उस दिन मुंह पर दो देगी

मनुष्य करने को अपने सपने साकार
देना चाहता पृथ्वी को नया आकार
भटकता फिर रहा यहां वहां
ये जानने को के जीवन के है कितने प्रकार

झूठा जीवन जी रहा
हकीकत को है रहा नाकार
पृथ्वी का सारा पता नही
अंतरिक्ष में झक रहा है मार

सुला देगा सबको सदा के लिये
प्रकृति का एक छोटा सा वार
मानव कमजोर है बहुत भीतर से
मरने के नाम पर देखो कितनों को चढा बुखार

छोडो यारों इस अंधी होड को,सबको जीवन रहा पुकार
खींच लिया सारा पानी, अपनी प्यास बुझाने को
कर दिये गहरे गडढे, अपना घर बनाने को
निकाल लिया ज्यादातर खनीज, खुब सारा कमाने को

नही आता अपने समय पर, कोई भी मौसम अब तो
काट रहा अंधाधुद पेड, प्रकृति को सताने को
मार रहा जानवरों को, अपनी हवस मिटाने को
नही जानता के ये गहरे गडढे, काम आएंगे खुद उसको दफनाने को

सबकी कब्र का इंतजाम एक साथ हो रहा
एक दिन जरूर आएगा यह बात समझाने को
संभल कर चल अ मानव
वजूद अपना बचाने को

वरना कफन भी नसीब नही होगा एक भी लाश को
जिंदा कोई भी ना होगा दूसरे पर कफन चढाने को
सर्वनाश निश्चित है कोई नही बचेगा
किसी भी चिता को आग लगाने को

नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

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