Best Evergreen Love Poems Hindi I बेहतरीन प्रेम कविताएं

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Poems About Love Hindi: दोनों ही डरते थे हम ज़माने से

दोनों ही डरते थे हम ज़माने से
ये मोहब्बत निभाना
ना तेरे बस का था
ना मेरे बस का था ।

देखते रहते थे इक दूजे की सूरत को
कोई मोहब्बत का तराना गुनगुनाना
ना तेरे बस..........
ना मेरे बस..........

युहीं डरते डरते मिलते रहे हम तुम
अपने घरवालो को समझाना
ना तेरे बस ......
ना मेरे बस ......

बेवजह हुई हम दोनों के बीच मोहब्बत
ये मोहब्बत का अफसाना
न तेरे बस........
ना मेरे बस.......

चाहते हुए भी ना तोड़ पाए कभी अपने रिश्ते को
किसी बेकसूर का दिल दुखाना
न तेरे बस......
ना मेरे बस.....

जितना अरसे भी की डरते डरते की हमने मोहब्बत
किसी के दामन मे मुँह छुपाना
ना तेरे बस.....
ना मेरे बस .....

सिर्फ खाब देख कर हम दोनों जीते रहे
हकीक़त के महल बनाना
ना तेरे बस.....
ना मेरे बस.....

झुकी आँखों से निभाते रहे हम रिश्ता
ये गर्दन उठाना
ना तेरे बस......
ना मेरे बस......

लोग उड़ाते रहे मजाक हमारा
ज़माने को आँखे दिखाना
ना तेरे बस......
ना मेरे बस ......

रहते थे हमेशा पढाई मे गुम
किसी की खातिर पलके बिछाना
ना तेरे बस ......
ना मेरे बस ......

आज हो चुके है जुदा
पर एक दुसरे की खातिर आंसू बहाना
ना तेरे बस .......
ना मेरे बस ........

ये तो होना ही था एक दिन
क्योंकि उम्र भर रहना बनकर दीवाना किसी का
ना तेरे बस.......
ना मेरे बस......

माना सच्चे आशिक मिट जाते है एक दूजे के लिये
सिर्फ मोहब्बत की खातिर भरना जान का जुर्माना
ना तेरे बस......
ना मेरे बस......

अब इतने अरसे बाद भी चली आती हैं तेरी यादें
इतनी आसानी से एक दुसरे को भूल जाना
ना तेरे बस........
ना मेरे बस ........

नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

Poems About Love Hindi: शातिर सनम

कितने शातिर हैं वो राज की बात छुपाने में
नजर आती है साजिश उनके हर बहाने में

इक तूफान आता है सबकुछ तबाह कर देता है
अरे उम्र बीत जाती है खुद को बसाने में

तेरी यादें घुली है जिस्म में सांसो की तरह
तेरा नाम जरुर आयेगा मेरे हर फसाने में

पालते है दुलारते है जानवरों को बच्चों की तरह
शर्म आती है लोगों को अपने माँ बाप घुमाने में

वक्ते-कहर ही पता चलता है आदमी को
कितने लोग अपने है इस बेदर्द जमाने में

तोलते है जमाने वाले हर मदद को शक की निगाहों से
अरे खुद को रुलाना पड़ता है किसी को हंसाने में

आसान नही होता हर गम को हंसते हंसते पीना
सदिया बीत जाती है रूह को रूह बनाने में

क्या समझे नई फसल इज्जते-खानदान को
जाने कितनी पीढियां गल जाती है इज्जत बनाने में

यूं तो हर साँस आती है जमीं पर मरने के वास्ते
असली मजा तो है लेकिन,वतन पर जान गवाने में

तू अब लिख ना पाता है नीरज पहले सी शायरी
क्या करूं मैं उलझा रहता हूँ जिन्दगी के ताने बाने में
नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

Sad Love Poem Hindi: बेपनाह प्यार मत कर

अपनी धडकनों को धडकने से इंकार मत कर
सब कुछ कर लेकिन किसी से बेपनाह प्यार मत कर

अ मानव जो तुझे खुद अपने लिए पसंद ना हो
दूसरों से कभी वो गंदा व्यवहार मत कर

हार तो पहला कदम होता है जीतने की ओर
पर हार को कभी दिल से अ मानव स्वीकार मत कर

तरसता ही रहें कोई तेरा अपना ही तेरी मदद को
इतना ज्यादा भी अ अमीर खुद को तू खुद्दार मत कर

भरने को तू अपने बेदर्द,कभी न भरने वाले खजाने
खुद को खुद से,वतन से,माँ बाप से गद्दार मत कर

खुरच खुरच कर उतार लेती है किस्मत इंसान की खुशियाँ
धन दौलत शौहरतों पर हद से ज्यादा खुमार मत कर

खरीदनी पडती है खुशियाँ तो अपना पसीना बेच कर
घर बैठे बैठे कामयाबियों का तू इंतजार मत कर

घुमती है जालिम दुनिया अपने हाथों में तेजाब लेकर
अपने घावों का महफिलों में कभी इजहार मत कर

अपने वक्त पर होगा उजियारा जहानो में प्यारे
स्याह रातों में खुद को रोशनी के लिये बेकरार मत कर

गम की स्याही से लिखी है हर गजल इस नीरज ने
गलत ही चाहे लिखी,पर इसमें अ जमाने तू सुधार मत कर
नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

Love Poem Hindi: दिवारों से भी एक आवाज

दिवारों से भी एक आवाज सुनाई देती है
क्या बताएं कितने दर्द,बेदर्द तन्हाई देती है

बाद बेवफाई के हो जाता है इंसान जिन्दा लाश
गवाही जख्मों की जिस्म के रोम की पाई पाई देती है

हराम की दौलत किसी बेवफा सनम से कम नही
वफा आदमी को दुनिया में सिर्फ सच्ची कमाई देती है

देता है अगर बाप जिस्म को फौलाद की मजबूती
तो माँ रूह को जिन्दगी जीने की गहराई देती है

गिरने नही देती मुश्किल से मुश्किल दौर में भी
हौसला उड़ने का औलाद को बाप की कलाई देती है

मत बन अ मानव तू इंसान से हैवान,बाद में पछतायेगा
प्यारी मानवता हर रोज मानव को दुहाई देती है

सीखनी है तो सीखो सदा प्यारी अच्छी बातें ही
ये वो सौगात है जो रूह को नरमाई देती है

चाहकर भी ढूंढ ना पाओगे कोई उम्रभर साथ निभाने वाला
साथ उम्रभर इंसान का सिर्फ उसकी परछाई देती है

वो मोहब्बत ही क्या जिसमे शिकवे शिकायत ना हो
इश्क करने का असली मजा तो हमदम की रुसवाई देती है

क्या क्या खूबियां है किसी दिलबर की अ नीरज
सही सही एकदम पक्का हिसाब तो जुदाई देती है
नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

Love Poem Hindi: अह्सासे-इश्क मखमली

आजकल रहती है धड़कने थोड़ी जली जली
ना जाने कहा चला गया,वो अह्सासे-इश्क मखमली

ताउम्र ढूँढते रहे, मर गये पर मिली ही नही
एक भी ना थी जहानो में इश्क की पूरी गली

तेरा अहसास भी यूँ है जैसे जन्नत करीब हो
तेरी याद क्या आई,सांसो में,रूह में कोई खुशबु घुली

राहें इश्क की बुलाती रहती है हर वक्त यूँ बशर को
अहसास होता हर पल,जैसे नई जन्नत की कोई खिड़की खुली

माँ की दुआओं का असर मुझपर तो ये रहा सदा
मुझ तक पहुंचने से पहले ही मेरे पीछे पड़ी हर बददुआ टली

तोहमतें देते रहते है लोग,इंसान की खाक को भी
ऐसी गंदी मतलबी जिन्दगी से तो दाता मौत ही भली

इस जन्म में बनाकर आदमी को बेबस गरीब मजबूर
परमात्मा पिछले जन्म के पापों की कर लेता है सारी वसूली

देखकर हजारों शैतानों का जमीन पर भयानक हश्र
लाखों करोड़ो शैतानों की फिर भी नही आंखे खुली

दोस्त मेरे सारे,मुझे खुदा से भी ज्यादा अजीज है
देखते ही उनको खिल जाती है मेरे जिस्म की कली कली

क्या सजा मूकरर हो बलात्कार के दरिंदो की अ 'नीरज'
एक ही सजा सरेआम सूली,सरेआम सूली, सरेआम सूली
नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

Poems About Love Hindi: दिल को दिल तो बनाइये

मन को अपने,आप जरा समझाईये जनाब
मत इतना ज्यादा बेदर्दी से कमाइये जनाब

हर जिस्म लेकर घूमता है एक चीज पत्थर की
दिल को अपने दिल कभी तो बनाइये जनाब

नजर आयेगा तुम्हें,दिल के चरागों तले अंधेरा
अपनी सोच को थोडा तो ऊपर उठाइये जनाब

जब निभाती है कुदरत माँ बनकर संग तुम्हारे
आप भी तो बेटा होने का धर्म निभाइये जनाब

अंधी हसरतें रुलाती रहती है रूह को तुम्हारी
कभी तो अपनी सांसो को उनसे बचाइये जनाब

कांच के दिल होते है हजारों लोगों के दुनिया में
टूट जाएंगे मत गरीब को इतना दबाइये जनाब

मुर्दे को सूंघ कर हम बताते वो किस गम में है मरा
मत अपनी बातों से आप हमें बहकाइये जनाब

यादें यादों में आकर कर देती है जख्म हरे
कभी तो अपने आप को,आप भुलाइये जनाब

मालिक नही है हम,इस अदभुत वतन के यारों
बन कर माली वतन का उपवन महकाइये जनाब

हाजिर है जान हमारी अपने दोस्तों की खातिर
जब जी चाहे आप हमें आजमाइये जनाब

जब जब भी हो जरूरत सकुन की तुम्हें
तो 'नीरज'की गजलें दिल से गाइये जनाब

नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

Poems About Love Hindi: रूह को दिलबर थाम ले तू

हर एक गम हो जायेगा कहीं पर छू
बस मेरी रूह को दिलबर थाम ले तू

सो कर बार-बार माँ के आंचल तले
जमीन पर ही जन्नत हमने पाई है यूं

छुट जायें हाथ अपनों के बेदर्द भीड़ में
इतना भी अच्छा नही होता कमाई का जुनू

गुलाम है जो जो जमीन पर सिर्फ दौलत के
रात को नींद,ना मिलता उन्हें दिन को सकूं

किस्मत राहों पर आगे आगे चलें ना तो कहना
कभी देकर तो देख दान किसी को अपना लहू

नही कर सकता में तेरी कोई भी ख्वाइश पूरी
तेरे झूठे अश्कों से आती है मुझे तेजाब की बू

मत रो अ गरीब बालक तू देख कर अमीरों की शान
आ मेरे बच्चे मैं तेरी झोली में भी सितारे भर दूं

दबाये बैठा है हर अमीर अपने कदमों तले सैंकड़ों खुशियां
वो कहता रहे खुद को भगवान,अपनी तो है उस पर थू

हर घर में बिखरी हो सिर्फ चैनो-अमन की रेत
कुछ तो ऐसा काम मैं मरने से पहले जरुर करूं

लड़ते हुए तकदीर के सितमों से अ दोस्त
तूने इस गरीब नीरज को पुकारा ना क्यूँ

नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

Poems About Love Hindi: हम सनम को देखते है

कभी जमाने के, कभी अपने गम को देखते है
हम फिर परेशान होकर प्यारी कलम को देखते है

जब जब भी हसरत होती दिदारे-माहताब की हमको
सामने बैठा कर सलीके से हम सनम को देखते है

गिरा ना दे जालिम रस्ते,कहीं रस्तों में हमको
हम बड़े अदब से उठाये अपने हर कदम को देखते है

यूँ लगता है के मेरा गम कुछ नही खुदा के गम के आगे
जब भी हम दयालु अब्र से होती छम छम को देखते है

सचमुच कही डूब कर मरने को ये जिस्म चाहता है
जब भी हम रूह के भीतर छुपे अहम को देखते है

हकीकत यही है के रो पडती है अपनी रूह की रूह भी
जब भी हम मजदूरी करते किसी बालक के दम को देखते है

मर जाते है अपने तो तुख्मे-खवाइश भीतर ही कहीं
जब किसी गरीब के पांचवी बेटी के जन्म को देखते है

कहता है दिल के ये इश्क शायद चंद रोज भी ना चले
जब उल्फत में हम सितारे तोडती झूठी कसम को देखते है

दिखता है उस उस जगह हमें तो जन्नत का नजारा
जहाँ जहाँ भी हम माँ बाप के पड़ते कदम को देखते है

क्या कभी सुधरेंगे हालात इस हिंदुस्तान के अ नीरज
दिल से सदा ना निकलती जब लोगों के करम को देखते हैं

नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

Love Poem in Hindi: सब कुछ समाया है प्यार में

बहता है हर जिस्म मे
मिलता है कई किस्म मे
हर एक को जरूरत इसकी
कभी ना होता बेकार में
सबकुछ समाया है प्यार में

करता नवयुग का निर्माण
कभी ना मांगता कोई प्रमाण
किसी ना किसी रूप में
बहता रंग रंग की धार में
सबकुछ समाया है प्यार में

कोई भाषा इसकी स्पष्ट नहीं
करने पर मिटते कष्ट नही
कैसे बताएं अब तुम्हें
दिखता है कैसा आकार में
सबकुछ समाया - - -

अजीब होती है ये चाहत
करके किसी को ना मिलती राहत
किसी पढ़ाई की जरूरत नहीं
शिक्षित से भी ज्यादा हो गवार में
सबकुछ समाया ...........

जरूर कंरूगा वो अपना खसारा(घाटा)
कभी ना मिलेगा उसको किनारा
जरूरत से ज्यादा जो करेगा
या जो सम्मलित करेगा व्यापार में
सबकुछ समाया - - - -

ये बसा है पत्ते पत्ते डाली में
ये छुपा है प्यार की गाली में
कभी दिल से करो स्वीकार इसे
दिख जाएगा तुम्हें कागज के हार में
सबकुछ समाया - - - - -

देखो गर्दन उठाकर कुछ चीजें खास
ये धरती,ये नदिया, ये बादल,ये आकाश
सिर्फ विनाश को ना कोसो इसके
अंदर जीवन छुपा है हर फुहार में
सब कुछ समाया - - - -

बेवजह नही बहती ये मदमस्त हवा
जीवन कुंजी की है ये सबसे जरूरी दवा
सन्देशा देती घुमती गली गली
कभी खुद को भी तो बांधो मेरे इश्क तार में
सब कुछ समाया - - - - -

देखो ध्यान से क्या लेती जा रही है पृथ्वी आकृति
विमुख होती जा रही है हमसे प्रकृति
सिर्फ मजबुरी में गर्दन मत हिलाओ
सच भी शामिल करो अपनी स्वीकार में
सब कुछ समाया - - - - -

अरे किसी ने तो सोचा होता काश
अब रो रहे है जब दरवाजे पर खडा है विनाश
कर बैठेगे सदियो पुरानी सभ्यता खत्म
अपने मामूली से झूठे अहंकार में
सबकुछ समाया - - - - -

अंधी भागदौड़ में बहकर सब असली मूल्यों से हटे
जाति धर्म आर भी ना जाने हम कैसे कैसे बंटे
किसका नाम ले ओर किसको छोड़े
सने हुए है सब के सब गार में
सब कुछ समझाया------------

अपनों की चोट पर नही बहती अश्रुधारा
हर मीठा रिश्ता हो चला है खारा
मत विश्वास करो अपनो के मिलन पर
किसी साजिश की बू आती हर व्यवहार में
सब कुछ समझाया------------

ले रही है धरा अतिम सांसे
जैसे बुर्जग रात की खामोशी में तन्हा खासे
कुछ ना होगा चाहे कितने मर्जी प्रयास करो
जंग लग चुकी है हर आधार में
अब कुछ समाया है प्यार में

लूट चुके है हम सारी सचित पूंजी
जो थी जीवन जीने की कुंजी
हवा,पानी,रोशनी या फिर जमीन
बताओ सबसे पहले क्या खाना चाहोगे चार में
सब कुछ समाया--------------

बहुत हो चुके धरती पर मिलन
देह महसूस करने लगी है अतिंम जलन
बस कुछ दिनो की बात ओर है
अब मिलेंगे सभी दाता के दरबार में
अब कुछ समाया है प्यार में

नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

Love Poem in Hindi: तेरा अहसास

अहसास तेरा हर वक्त यूं रूह को महकाता है
जैसे जीवन को महकाता है स्वस्थ सांसों का शोर ||

तुम बस चुकी हो मेरे रोम के हर कण में यूं
जैसे हवा से आती है सबको जीवन की खुशबू ||

कब का साथ है और कब तक रहेगा जानता नही मैं
पर अहसास है पूरा शायद, ब्रह्मांड में कहीं भी जीवन हो तब तक ||

तुमसे पहले भी रहा हूँ, बहुत अकेला पर तनहाईयों के मायने
तुमसे मिलकर ही पता चले है मुझको ||

तेरी नजदीकियां यूं मेहरबान रहती है मुझ पर
जैसे अब्र (बादल)कोई हर वक्त नजर रखता हो
किसी खेत पर कहीं ये पानी के अभाव में सुख ना जाए ||

तुम बिन तनहाइयां यूं खत्म करती है मुझको
जैसे पतझड़ चर जाती है वातावरण से हरियाली ||

लिख कर बताना चाहता हूं तुमको के मैं सचमुच अधूरा हूं
बिन तुम्हारे ऐसे जैसे सितारों रहित हो रात कोई
या फिर प्रत्येक दिवस अधूरा है सूरज बिन ||

हर पल जिसको दिल गुनगुनाए तुम वो गाना हो
जीवन को जो रोमांचित करे तुम वो बहाना हो ||

नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

Romantic love Poems Hindi: इश्क का जादू

जो मार देता नजरों से वही कातिल कहलाता है
जो थाम लेता सागर को वही साहिल कहलाता है
यूँ तो हजारो की भीड़ है दुनिया में लेकिन
जो धड़कता दिलबर के लिये, वही दिल कहलाता है ||

हर एक दिल में यहां एक अलग कहानी है
कोई खुश है बहुत, किसी को बड़ी परेशानी है
देकर दिल किसी को अपना, जरा देखो अ मेरे यारों
फिर तो ताउम्र रहती मौज, होती बड़ी आसानी है ||

मेरे सांए के पीछे, चलती है किसी की परछाई
रो पड़ता हूँ मैं अकसर जब भी यादें तेरी चली आई
जिस रात उमड़ आता जहन पर तेरी यादों का समन्दर
हम ही जानते है किस तरह करवट बदलकर वो रातें हमने है बिताई ||

करते हैं बहुत कोशिश के किसी को ना बताएं
अपने दिल का कोई भी राज
पर बेईमानी कर जाता है दिल हमारा
खुद लगा देता है आवाज ||

हुई बड़ी कठिनाई हमें आज राह चलते चलते
वही नजर आ गया नजरों को,जो हमसे था कई दिनों से नाराज
है शिकायत उनसे जो लगाकर दिल भूल जाते हैं
हम ही जानते हैं के एक साथ भीतर कितने शूल जाते हैं ||

खा तो लेते हैं कसमें जन्मों तक साथ निभाने की
झूठे तो बनते ही हैं साथ में सारे उसूल जाते हैं
मैं रो पड़ता हूँ जब गुजरा जमाना याद आता है
उम्रभर जो निभाएं साथ, अब तो जमीन पर कोई एक आध आता है ||

तुझे छोड़े हमारा दामन गुजर चुका है अरसा अब तो
लेकिन आज भी इन लंम्हों पर खुदा का नम्बर तेरे बाद आता है ||

नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

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