10+ Best Life Poems in Hindi | जिंदगी पर हिंदी कविताएं

Best Hindi Poems on Life: कुछ चुनिन्दा जिंदगी पर आधारित कविताएं हिंदी में (life Poems in hindi) जो जिंदगी को समझाती है, और बेहतरीन तरीके से जिंदगी को दर्शाती है | हमें जिंदगी की अहमियत और असलियत का ज्ञान कराती है | Neeraj Bansal की जिंदगी पर हिंदी कविताएं.......



    Hindi Poems on Life  2020

    * सिखाकर लाखों को
    समुंदर पार करने का हुनर
    पड़ा हूं मैं किनारे पर
    टूटी कश्ती सा
    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Life Poem in Hindi: ये क्या हो गया (अनर्थ)

    एक से एक दुर्घटना हो जाती है जमाने में
    किसी शेर सा कलेजा चाहिए उन्हे सुनने सुनाने मे
    आसान नही हर एक को खुश रख पाना जिंदगी में
    कई बार रूह से रूह बदलनी पड़ती है रिश्ते निभाने में

    एक दिन एक आदमी अपना सपना करना चाहता था साकार
    अपनी इच्छा पूरी करने वो लेकर आया घर में कार
    जो कई कई दिन यूं ही खड़ी रहती थी घर में बेकार
    क्योंकि साहब तो बाहर रहते थे ओर हफ्ते में एक ही दिन आता है रविवार

    चंद मीलो ही बस चल पायी थी
    पैट्रोल कम लगा था, उससे मंहगी उसकी सफाई थी
    वक्त कम होने की वजह से
    साहब ने बस दो महीने में सिर्फ चालीस किलोमीटर घुमाई थी

    घर में एक बीवी एक बच्चा था
    छोटी उमर का था समझ का थोड़ा कच्चा था
    पढ़ने लिखने मे भी था बहुत होशियार
    मम्मी पापा को बहुत चाहता था, दिल का बिल्कुल सच्चा था

    नादानी की उमर थी एक दिन कार में मार दी उसने चंद खरोंचे
    उसके बाप ने देख लिया, बहुत गुस्सा हुआ बदल गई उसकी सोंचे
    आव देखा ना ताव, गुस्सा सिर चढ़ कर बोल रहा था
    बेरहम बाप किसी, हथौड़े से अब तो बच्चे के ही हाथ और पैर खोल रहा था

    एक पर एक बच्चे के कोमल हांथो पर उसने किये कई वार
    कंडम हाथ कर दिए, ये निकला उस मारपीट का सार
    गुस्सा खत्म होते ही उसको हुई बच्चे की सोच
    बुरी तरह रो रहा था मासूम,
    असहनीय दर्द के कारण बेचारे की चीख रही थी चोंच

    जख्मी हालात मे बाप बेटे को लेकर हस्पताल भागा
    तब तक बेहोश हो चुका था मासूम बेकसूर बच्चा अभागा
    होश आते ही उसने सबसे पहले अपने पिता को देखा
    एक प्रश्न किया,क्यूँ आपने मुझ पर अपना हथौड़ा था दागा

    चाह कर भी अपने हाथो को हिला ना पाता था
    तीनो वक्त की रोटी किसी दूसरे के हाथो से खाता था
    और आज भी उस बेरहम पिता के बिना उसका मन नही लगता था
    क्योंकि वह तो सबसे ज्यादा उसी को चाहता था

    सारे,कामो से निबट कर बाप ने एक दिन कार की उस जगह को देखा
    जहां कभी उस मासूम ने बनाई थी कुछ रेखा
    अचरित होकर खून के आंसू रोने लगा
    खड़े खड़े ही अपना असितत्व खोने लगा

    पढ़कर उन चंद खरोंचों को वह अपनी कार भूल गया
    एक एक अक्षर उस पर ऐसा लिखा था,
    जैसे भीतर आत्मा तक कोई शूल गया
    समझ गया सारी बात के उस दिन गुस्से के
    आगे सारे जज्बात हारे है
    क्योंकि कार पर लिखा था,
    मेरे पापा इस दुनिया मे सबसे प्यारे है

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Hindi Poems about Life: इरादा

    चाहे नजर ना आये कहीं उजाला
    चाहे लगा हो हर चौखट पर ताला
    चाहे कहती रहे दुनिया मुझे मतवाला
    भरकर नैनों में दिव्य ज्ञान ज्योति
    हर गलत बात पर कलम जरूर उठाऊंगा
    पर मैं दीया जरूर जलाऊंगा

    चाहे रहे सदा मेरे जमाना विरूद्ध
    चाहे कितनी मर्जी हो राहें अवरूद्ध
    चाहे रोकने आ जाएं मुझे फरिश्ते खुद
    भरकर तूफानों सा हौसला सांसो में
    मैं कोशिश कर हर डूबते को बचाऊंगा
    पर मैं दीया जरूर जलाऊंगा

    चाहे करना पड़े मुझे खुद का खात्मा
    चाहे धधकती रहें मेरी व्याकुल आत्मा
    चाहे साथ ना दे मेरा दयालु परमात्मा
    जिंदा हूँ जब तक जमीन पर मैं तो
    हर हाल में अपना मानव धर्म निभाऊंगा
    पर मैं दीया जरूर जलाऊंगा

    मेरी प्यारी रूह तू मेरा साथ देना
    डूबने लगूं जब मुझे अपना हाथ देना
    नजर आऊं भीड़ से अलग सूरज सा
    औरों से अलग मुझे कुछ तो बात देना
    दर्द भरा है अपनों की खातिर दिल में इतना
    के सांसे है जब तक,तब तक प्रेम गीत गाऊँगा
    पर मैं दीया जरूर जलाऊंगा

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Life poem in Hindi: हलचल कही मैंने

    हो रही दिल में, वो हलचल कही मैंने
    जमाने ने ये समझा, कोई गजल कही मैंने
    वो समझ कर आज मुस्करा रहा है उसको
    कोई बात गहरी, उसको कल कही मैंने

    दिल की जमीन पर बोना देशभक्ति के बीज
    हर नौजवान को सबसे अच्छी फसल कही मैंने
    शरमा गई हजारों परियां, खूबसूरत जन्न्त की
    जब निगाहें यार की, अदभुत कंवल कही मैंने

    अंगारों भरी नजर से देखा नौजवान ने मुझको
    देखकर गली तवायफ की, जब उसे चल चल कही मैंने
    बज उठी महफ़िल में गूंज तालियों की हर ओर
    माँ की सख्त हथेलियां भी, जब मलमल कही मैंने

    चुराने लगी है बिटिया,जबसे नजर मुझसे बार बार
    ना जाने कितनी दफा खुद को, सम्भल कही मैंने
    खुश होकर बैठा लिया, किस्मत ने मुझे अपने कंधों पर
    बाप के पसीने की महक, जब खुशबु-ए-सन्दल कही मैंने

    कई रोकर मुस्कुराए, कई मुस्कुरा कर रो दिये
    जब महफ़िल में, दिल में हो रही उथल-पुथल कही मैंने
    तुमसे बेहतर किसी ने लिखा नही 'नीरज', महफ़िल ने कहा
    जब मां की मुस्कान नक्काशी-ए-ताजमहल कही मैंने

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Poem on life hindi: कलम ओर दवात 

    ये कैसे अद्भूत मोती अल्फाजों के अ मालिक तूने मेरे ख्यालों में बो दिए
    जब भी देखा कोई कोरा कागज मेरी कलम और दवात रो दिए

    बेवजह बरसाई तूने रहमतों की बरसात क्रकीट के जंगलो पर
    हजारों करोड़ो अनमोल मोती तूने बिन बात के खो दिये

    जिन आशियानों को इंसानो ने बनाकर कभी संभाला ही नहीं
    नेक दिल परमात्मा ने करके बरसात सारे के सारे धो दिये

    नहीं माना जब, मर्द सख्ती से कोई बात बीवी की
    हारकर आखिर में बीवी ने चंद आंसू पति को चुभो दिये

    सारे दिन फैलाकर जग में उजियारा करके रोशनी
    थकहार कर आखिर में उजाले भी सो दिये

    कहीं चांद तन्हा अकेला ना महसूस करने लगे खुद को अंधेरों में
    शायद यही सोचकर करोड़ों सितारे मालिक ने फलक की चादर में पिरो दिए

    जिस जिस को भी हंसकर गम का दरिया पार ना करना आया
    तकदीर ने वे सारे के सारे भय के प्यालों में डुबो दिये

    मुकर रहा था कोई अपना ही चंद रुपयों की खातिर
    दी जब उसको उसकी इकलौती औलाद की कसम,तो दिये

    हम तो शायर है नहीं जानते तेरा मेरा अपना पराया
    जिसने भी प्यार से करीब बैठाया, ताउम्र के लिये कर्जदार उसके हो दिये

    आखिरी हद तक सहन करती कुदरत इंसानो का जुल्म'नीरज'
    जब सहन से बाहर हो गया तो कुदरत ने भी पलट कर,दो दिये

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Life Poem in Hindi: जमीन पर जन्नत

    जन्नत का जमीन पर ही निर्माण कर लिया
    जिस जिस ने भी खुद को इंसान कर लिया

    उठाकर किसी गरीब लाचार को जमीन से
    खुद को जमीन से ऊँचा आसमान कर लिया

    अ मानव तुझे तो बनाकर भेजा था भगवान जमीन का
    क्यूं तूने खुद को शैतान सा बेईमान कर लिया

    कोसते रहते हैं लोग हर वक्त दूसरों की शौहरतों को
    अच्छे भले जन्नत से जिस्म को शमशान कर लिया

    पाल लिया समझो उसने एक नर्क अपने भीतर
    जिस जिस ने भी अपनी कामयाबियों पर गुमान कर लिया

    करके हर अपने पराये की दिल से मदद
    मुश्किल जीवन को हमने बड़ा आसान कर लिया

    जब भी करना चाहा बेदर्द तकदीर ने हम पर वार
    हमने किसी मासूम बालक सा खुद को नादान कर लिया

    हटाता गया मालिक उसकी राह से हर कांटे को
    जिस जिस ने खुद को उसकी खातिर परेशान कर लिया

    करके किसी संगदिल सनम से इश्क का इजहार
    हमने ठीक ठाक चलती सांसो को तूफान कर लिया

    नही बैठती सरस्वती माँ फिर कभी उसकी जिव्हा पर
    जिस जिस ने अ नीरज लिखने पर अभिमान कर लिया

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Hindi Kavita on Life: इंसानियत

    सिर्फ अपनी सांसे सबको प्यारी हो गयी
    इंसानियत के मरने की पूरी तैयारी हो गयी

    क्या हासिल करोगे जीत कर दूसरों से
    जब अपनों से ही मात करारी हो गयी

    ताजी हवा परेशान करती है जिस्म को
    सबकुछ जीवन में अब तो चारदिवारी हो गयी

    मौत ही असल हकीकत है जीवन की
    क्यों सबको इतनी जानकारी हो गयी

    माँ बाप भाई बहन सब मतलब के रिश्ते हैं
    शायद जानवरो सीे नस्ल हमारी हो गयी

    मजा आता नही अब तो किसी भी बात पर
    गुम कहीं वो बच्चों की किलकारी हो गयी

    मंदिर मस्जिद क्या आम क्या खास सब कुछ
    बेदर्द दौलत की दीवानी दुनिया सारी हो गयी

    ज्यादा कमाने की अंधी हवस में प्यारों
    खुद की कीमती सांसे ही हम पर भारी हो गयी

    हर एक साँस को जन्म देने वाली देवी
    इज्जत को मोहताज बेचारी नारी हो गयी

    इश्क करना इश्क फैलाना आदत है मेरी
    क्यूँ तुझको अ नीरज ये अजब बीमारी हो गयी

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Life Poem: गमों में भी मुस्कुराना सीखिये

    परवाह नही चाहे कहता रहे कोई भी हमे पागल दीवाना
    हम क्यूँ बतायें किसी को के हम जानते है गमों में भी मुस्काना

    जान तक अपनी लुटानी पडती है इश्क में
    ऐसे ही नही लिखा जाता मोहब्बत का अफसाना

    किसी लाश के पास खड़ी होती है साँस लेती लाशें
    मुर्दा कौन है,समझ जाओ तो मुझे भी समझाना

    टाल मटोल चल जाती है अपने जरूरी कामों में
    पर मौत सुनती नही किसी का कोई भी बहाना

    नूर ना हो जाये एक एक बूंद अश्क की तो कहना
    कभी माँ बाप की खातिर चंद आंसू तो बरसाना

    जब किस्मत साथ नही देती दिल से आदमी का
    तो मुश्किल हो जाता है दो वक्त की रोटी भी कमाना

    जिन्दगी में बहुत ज्यादा जरूरी है ये सीखना
    क्या क्या राज है हमें,अपनी रूह में छुपाना

    कितने हम गलत है ओर कितने है हम सही
    सुन लेना कभी चुपके से,बातें करता है खुलेआम ये जमाना

    हर गलती माफ़ कर देता है ऊपरवाला दयालु भगवान
    पर गलती से भी कभी ना तुम किसी गरीब को रुलाना

    गये वक्त नही है हम जो लौट कर ना आ सकें
    वक्ते-जरूरत अ दोस्त कभी तुम नीरज को आजमाना

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Hindi Poem on Life: कोई आया है स्वर्ग से

    घर में किलकारी गूंजी
    आज फिर कोई आया है स्वर्ग से
    पहले क्या कम भीड़ है जमीन पर
    जो एक ओर पहुंच गया मरने के वास्ते

    खुशियाँ पसरी हैं चारों ओर
    बधाई बधाई की आवाजें आ रही है
    नन्ही मासूम आँखे देख रही है इधर उधर
    दानवों ने क्यूं घेर रखा है चारों ओर से

    एक काया हर वक्त परछाई बनी रहती है
    मुझे हर हाल में जिन्दा रखने के लिये
    खो देती है अपना चैनो अमन औलाद की खातिर
    माँ ही तो सचमुच का भगवान होती है

    अभी से सारी सारी रात नींद ना आती
    आगे तो पता नही क्या क्या होगा
    परेशान माँ ने डाट दिया तंग होकर
    जिन्दगी के पहले कडवे सच मिल रहे है

    चलो आज घुटनों पर शहर घुमा जाये
    मेरे दाता ये दुनिया कितनी बड़ी है
    सारा दिन घूम कर इधर से उधर
    आखिर में थककर नींद आ जाती है

    आज पहली बार खुद के पैरों पर बाहर आये हैं
    जाने कहाँ भाग रहा है सारा शहर
    किसी के पास वक्त नही एक पल ठहरने का
    घर वापिस चलो माँ को चिंता हो रही होगी

    आज व्यस्क हो चूका हूँ
    बचपन जवानी बुढ़ापा सब समझ आ रहा है
    पड़ोस से किसी बुजुर्ग के मरने की खबर आई
    आदमी धरती पर आता है सिर्फ मरने के लिये

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Life Poem: खुद में खुद की ही हर पल तलाश

    आजकल एक काम ये अनोखा खास कर रहा हूं
    मैं खुद में खुद की ही हर पल तलाश कर रहा हूँ

    गिर चूका हूँ मैं मतलबी, गिरावट के हर स्तर तक
    कुछ मत कहो, मैं खुद ही इसका अहसास कर रहा हूँ

    दूसरों की शौहरतें कुतरती है मेरी प्यारी रूह को
    बेवजह,बिन कारण मैं खुद को जिन्दा लाश कर रहा हूँ

    आती है किस्मत तो चली आ मेरी पनाहों में आज अभी
    मैं मौत से पहले की धड़ी अब आभास कर रहा हूँ

    सुननी है तो सुन ले अ महबूबा मेरी रूह की धडकनें
    मैं अपनी रूह को अ दिलबर तेरे पास कर रहा हूँ

    सोचता हूँ क्या तोहफा दूँ मैं अपने अजीज दोस्त को
    अ दोस्त तुझको नजर, मैं अपनी हर साँस कर रहा हूँ

    बहुत कुछ बनाया है अ खुदा मैंने तेरी सोच से भी परे
    अब हवस सिर चढ़ चुकी है,अब मैं विनाश कर रहा हूँ

    बहुत ढूँढा पर खोज ना पाया मैं खुद को जहानो में
    समझ आया है के मैं माँ बाप की रूह में निवास कर रहा हूँ

    गया है कल कोई इस दुनिया से खाली हाथ,जाने कहां
    फिर क्यूँ अ भगवान मैं खुद को इतना बदहवाश कर रहा हूँ

    सिर चढ़ चूका है अ शायरी तेरा जूनून इस 'नीरज' पर
    वाह वाह करती है दुनिया, चाहे मैं बकवास कर रहा हूँ

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Poem on life Hindi: रूह जख्मी हुई कब

    कहां गिरे कैसे गिरे,ये रूह जख्मी हुई कब
    मत पूछो अ यारों तुम मेरे रोने का सबब

    करते नही बड़ों को झुक कर सलाम अब तो
    भूल गया नया दौर वो पुराने सलीके के अदब

    मत ले जालिम तू अपने घर जाने का नाम
    इधर तू उठेगी उधर हो जायेगा बड़ा गजब

    नजर आता है हर और सिर्फ वतन ही वतन
    मैं तिरंगे को दिल की नजरों से देखता हूं जब

    खुदा का नम्बर भी आता है बाद इनके लबों पर
    माँ बाप से तो बहुत ज्यादा छोटा होता है रब

    हर रूह को रहती है एक अजीब सी बैचनी हर वक्त
    शायद कोई तबाही का सामान ढूंढ रह हैं हम सब

    माँ कभी बेवकूफ नही होती,समझो अ नादानों
    सारी बातें तब समझती थी जब खुलते नही थे लब

    जो कर रहा था कुछ देर पहले तक सलीके से बातें
    देखते ही किसी फकीर को बेवकूफ हो गया बेअदब

    कभी ना लबों पर काम की खातिर कल आना चाहिये
    हमेशा यही प्रयास रहे,के हाँ आज ही,करता हूँ अब

    कृपा रहती है हमेशा माँ शारदे की मुर्ख नीरज पर
    भर दिया है उसने मेरी रूह को नये ख्यालों से लबालब

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Life Poems in Hindi: अलग पहचान

    जमाने में अपनी अलग पहचान लेकर मानेगा
    वो बड़ा जिद्दी है वो आसमान लेकर मानेगा

    दिल का दर्द गुजर चूका है हर बेदर्दी की हद से आगे
    देख लेना ये इश्क एक दिन हमारी जान लेकर मानेगा

    जिद है हमें के तोड़ कर लाने है सितारें जमीन पर
    दोस्तों साथ देना,मेरा ये जज्बा एक दिन उडान लेकर मानेगा

    उड़ा रहा है कोई हजारों हर रोज मयखानों में बिन बात
    देख लेना एक दिन उसका ये जनून खानदान की शान लेकर मानेगा

    हर रोज चला आता है एक शख्स हाल चाल पूछने मेरा
    घर की सारी जानकारी जरुर ये मेरा मेहमान लेकर मानेगा

    नाजायज उधारी,ब्याज का धन,बगैर उसूल का व्यापार
    मानों या ना मानों पर ऐसा धंधा जरुर सारी दूकान लेकर मानेगा

    घंटों बैठा रहता है एक शख्स माँ बाप के कदमों के करीब
    माँ बाप लाख गरीब हो चाहे,पर वो सारा जहान लेकर मानेगा

    पल पल हर पल रहता है कोई रब की भक्ति में लीन
    दिखावा दिखता होगा जमाने को,पर वो भगवान लेकर मानेगा

    ढा रहा है अन्धाधुन्द जुल्म कुदरत पर ये जालिम इंसान
    देख लेना सारी धरा को एक दिन ये वहशी इंसान लेकर मानेगा

    ना जाने क्यूं घमंड करता है नीरज आदमी मिटटी के खिलौने पर
    जानता है के हर एक को एक दिन कब्रिस्तान या शमशान लेकर मानेगा

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Hindi Poems on life: जिंदा लाश हैं हम

    रोती रहती हैं हर रोज अंधी हसरतें बिन बात
    सोये रहतें हैं अपनों की खातिर हमारे जज्बात
    करते है हम लाखों मीलों का सफर उम्रभर में
    पर कर ना पातें है हम ताउम्र खुद से ही मुलाकात
    बनाया था रब ने हमें तो भगवान जमीन का
    ध्यान से देखो खुद को, कितने खास है हम
    कुछ भी नही, सिर्फ एक जिंदा लाश है हम

    धरती पर परमात्मा स्वरूप माँ बाप प्यारे मिले
    मिलकर दोस्तों से पतझड़ में भी सुगन्धित फूल खिले
    पर देखकर अपनों को कभी ना दिल की कली खिली
    करते ही रहे हम ताउम्र अपनों से शिकवे-गिले
    बाकी जो बचा वो माँ कुदरत ने डाल दिया झोली में
    पर सब कुछ होकर भी, बिन बात उदास है हम
    कुछ भी नही, सिर्फ एक जिंदा लाश है हम

    रातों का सुख-चैन गवां कर, पैसा खूब कमाया
    पैसे की फिक्र में फिर अपना रूप रंग गवाया
    ढूंढते थे जिस सच्चाई को पैसों की आलिशान नगरी में
    वहां हर एक को सिर्फ और सिर्फ मतलब का यार पाया
    सबकुछ समझ आ रहा है, कुछ भी ना अब छुपा है
    फिर भी ना जाने क्यूं, हर साँस बदहवास है
    कुछ भी नही, सिर्फ एक जिंदा लाश है हम

    मानव नही दानव है हम, रब को ये बता रहें है
    रोज नये नये प्रयोग कर, हम कुदरत माँ को सता रहें है
    खोज तो रहें है हम रोज, नये नये जन्नत के रास्ते
    पर ये पता ही नही के हम सब, जहन्नुम की और जा रहें है
    करते अगर हम निर्माण मानवता का, तो ही मानव कहलाते
    ईश्वर भी अब तो कहने लगा है के किसी से खास नही, विनाश है हम
    कुछ भी नही, सिर्फ एक जिंदा लाश है हम

    रोती रहती है सारे जग को जन्म देकर भी, नारी बेचारी
    मांगती है आज भी भीख अधिकारों की, फिरती मारी मारी
    जीवन की जरूरत होकर भी, सिर्फ भोग विलासिता की वस्तु है
    हर साँस को हंसा कर, पाल कर भी खुद रोती रहती बेचारी
    भूल जातें हैं पल में हम अहसानफरामोश किसी के अहसानों को
    माँ को गंदी गाली देकर भी, सबसे खास है हम
    कुछ भी नही, सिर्फ एक जिंदा लाश है हम

    इतना जुल्म करके भी हम जिंदा हैं, बड़ा अजूबा है
    ये मानव कौम नही, ये तो वहशी, जंगली जानवरों का सूबा है
    सोचकर बताओ तो जरा कितना जीते हैं हम अपने वतन की खातिर
    खाक जियेंगे, एक एक पल तो हमारा खुद को संवारने में डूबा है
    खत्म हो जाती है प्यारी अनमोल जिंदगी, पर इच्छाएं जिन्दा रहती है
    बेवजह रोता रहता जो पूर्ण होकर भी, वो अहसास है हम
    कुछ भी नही, सिर्फ एक जिंदा लाश है हम

    उठा कर तो देखो प्यारों जिंदगी में कभी दूसरों के गम
    कभी बनाकर तो देखो यारों इस वतन को अपना हमदम
    खुशियों का पारा आसमान ना छू ले तो कह देना इस'नीरज' को
    किस्मत चूमेगी हर रोज कदमों को, कभी माँ बाप को समझो तो अपना सनम
    खुद के भीतर झांक कर देखोगे जब गहराई से, तन्हाई में
    उस दिन समझ आयेगा के बंजर जमीन नही, दयालु आकाश है हम
    कुछ भी नही, सिर्फ एक जिंदा लाश है हम

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Hindi Poem on life: जिंदा लाश

    भागदौड भरी जिंदगी में
    मर गए लोगाें के सारे अहसास
    नजदीक के रिश्ते दूर हो गए
    दूर के रिश्ते हो गए पास
    नफरत सिर चढ बोल रही
    अपनों से डरती है अपनाें की सांस
    कल तक जो होते थे गैर
    वो ही हो गए अब तो खास

    कमाकर खूब पैसा देख लिया
    रूह तो रहती फिर भी उदास
    असुरक्षित खुद को महसूस करता, अपनाें से
    सच्चे साथियों की करे बाजार में तलाश

    जोडकर सारे साधन ऐशो आराम के
    भटकता फिर रहा इधर उधर, होकर हताश
    सच्चा मजा तुझे मिलेगा तेरे खुद के घर में
    तूने सच्ची नजर से देखा होता काश

    फिर कहते हो अपने आपसे
    क्यूं ये जिंदगी मुझको ना आती रास
    अपनो की जान का, अपना ही दुश्मन
    ये कैसी निराली है आजकल की प्यास

    देकर गंदी गाली माँ बाप को
    बाहर जाकर खेले ताश
    नाराज करके भगवान को अपने
    तूने खुद ब खुद खोजा अपना नाश

    अपने घर का तू हो ना पाया
    सुसरालियाें का रहता बनकर दास
    माँ की तुलना मतकर जमीं पर कहीं
    माँ बन नहीं सकती कभी भी सास

    अपने अपना समझ, अगर गलत कुछ बोले
    उनकी कड़वी बातों में ढूंढो मिठास
    आकर बातों में दूजे की
    क्यूं कर रहे खुद अपना विनाश

    छोडकर जिद अपनी ज़रा
    एक दूजे पर, दिल से करो विश्वास
    अपने अहंकार को बिठाकर सिर पर
    मत बन बैठो, चलती फिरती जिंदा लाश

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Hindi Poem on life: जल ही जीवन है

    समझा समझा कर थक चुके है सारे ज्ञानी
    लेकिन फिर भी नही आती लोगो को अक्ल है
    बिना खाए तो मनुष्य निकाल सकता है कुछ दिन
    पर फिर से ये समझ लेना जल है तो कल है

    हमारी ही लगती जा रही है हमारे जल संसाधनों को नजर
    दिन व दिन नीचे होता जा रहा है पानी का स्तर
    कहां तो पैर जमीन पर मारने से ही फुट पड़ती थी जल धारा
    कहां कई कई सौ फुट पर भी नही मिलता, पानी बेचारा
    ताजे पानी की बुंद बुंद को तरसोगे, यही मनुष्य जीवन का आखिरी हल है
    जल है तो कल है

    यूं तो लाखों करोड़ो लीटर पानी लेकर चलते है सागर
    पर कोई भी भर नही सकता उनसे अपना गागर
    कौन पियेगा तेजाब को, वह तो बिल्कुल खारा है
    पर एक बात यह भी पक्की है के उसी तेजाब ने सर्वनाश करना हमारा है
    दिखने मे तो पानी जैसा, पर ताजे पानी की नकल है
    जल है तो कल है

    नहाने धोने पीने लायक ताजा पानी मिलना हुआ मुश्किल
    हम सब लोग ही तो है पानी की मौत के कातिल
    लूट लूट कर प्रकृति को एकदम नंगा कर डाला
    बेवजह बना दिया उसने हमें इंसान, हम कभी थे ही नही इसके काबिल
    घंटो घंटो बेवजह खुले रहते हमारे नल है
    जल है तो कल है

    चुसकर जमीनों को इंसानो ने कर दिया ताजे पानी का खात्मा
    देखकर करतूतें हमारी रोती है फिर कुदरत की आत्मा
    हर चीज से सम्पन्न करके दिया था हरा भरा देश उसने तो
    क्या था क्या बना डाला देखो भारत का भेष हमने तो
    हमने ही चीर डाला अपने हाथों से अपनी मां का आंचल है
    जल है तो कल है

    मिल रहा है अब तक पानी ये तो रोज कोई संयोग होता है
    पीने से ज्यादा पानी बेवजह शौचालयों मे प्रयोग होता है
    ताजे अद्भूत अमृत समान पानी को गंदी नालियों में हम व्यर्थ बहा रहे है
    थोड़ा देखकर चल अ मानव के हम किस राह पर जा रहे है
    मनुष्य तो सिर्फ रूप है जीवन का, पानी तो रूह में बहता बल है
    जल है तो कल है

    ऊपर से अंधाधुंध बढ़ती गर्मी, पिघला रही है हमारी जमा पूंजी
    बचा लो उस बर्फ को, जो जीवन की है अंतिम कुंजी
    हर रोज टपक टपक कर सैंकड़ो लीटर पानी सागर मे मिल जाता है
    समझो मनुष्य के जीवन छप्पर का रोज एक स्तम्भ हिल जाता है
    एक दिन नही दिखेगी ऐसी जैसी हंसती खेलती आज की शक्ल है
    जल है तो कल है

    बरसता पानी देखो जरा ध्यान लगाकर, ये तो है रब का साक्षात रूप
    यही है असली अमृत वर्षा बाकी सब कुछ जिस्म झुलसाती धूप
    कर लो जमा कही इस अकूत बरसते भंडार को
    इक्ट्ठी करके बुंदो की दौलत, रोको कुछ और साल हाहाकार को
    वरना फिर से हर तरफ हो जाने वही जंगल है
    जल है तो कल है

    एक दिन धन को लेकर अपने, ढुंढते रहना पर कही मिलेगा नही पानी
    रूपये जिंदगी नही खरीद सकते, ये बात किसी ने है कही सयानी
    थोड़ा संभलकर चल अ मानव आगे गुप अंधेरा है
    रूक जा सही रात गुजार, आगे सुनहरी सवेरा है
    वही देश बचेगा केवल, जो करता बातो पर अमल है
    जल है तो कल है
    जल है तो कल है

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

      Life Kavita in Hindi : जिंदगी पानी पानी

    आजादी मिल गई, घर के कैदियों को
    एक बुढी मां के सिवा, किसी की आंख में ना आया पानी
    मर गया बुर्जग घर का
    चलो ठीक हुआ, खत्म हुई कहानी

    सो गया आकर चुपचाप मां के आंचल तले
    महसुस हुआ जैसे लू के थपेडों में, लगती हवा सुहानी
    लडकर आया था वह तो बीवी से
    आज फिर से ताजा हो गई, सारी यादें पुरानी

    टुटे फुटे मकानों में भी जीते थे परिवार
    कहते थे ये आशियाना हमारा है खानदानी
    आजकल सिर्फ दो लोग रहते आलीशान बंगले में
    फिर भी सारा-सारा दिन रहती, आपस में खींचा तानी

    रूह जुडती नही रूह से कभी
    होकर रह गए सारे रिश्ते जिस्मानी
    अरे निभा लेते थे वे भी तो सारी उमर
    जिनके रिश्ते हो जाते थे जुबानी

    चंद लम्हों की मुलाकात,बदली सात फैरों में
    देखकर आजकल के नौजवानों की रफ्तार, होती बडी हैरानी
    और चंद रोज बाद ही आ जाती तलाक की नौबत
    अरे ऐसी भी क्या बदहवाश हुई,नई जवानी

    बाप को नींद ना आती रातों में
    जब से प्यारी बिटिया हुइ सयानी
    हर रोज कहता पत्नी से अपनी
    बस कुछ रोज और बरतो सावधानी

    बात को संभालना होता बहुत मुश्किल
    अहम में बातचीत बन्द करने में होती आसानी
    करके बोलचाल बंद अपने ही सगों से
    सारी उमर झेलते फिर परेशानी

    जुबान संभाल कर करते नही बातें नवयुवक
    किसी बदतजमीज की लगते है निशानी
    खोंस कर भाग गया फकीर के पैसे
    इंसानो ने भी सीख ली है अब तो हैवानी

    सीखना है तो देश चलाना सीखो
    क्यूं सीख रहे सब बंदूक चलानी
    अच्छे संस्कार तू दे रहा कर्णधारों को
    अ कलयुग तेरी बडी मेंहरबानी

    किसको सुध नही है अपनी
    बताओ कौन देगा अब दूसरों की खातिर कुर्बानी
    कहां से ढुंढ कर लाए, वो देश पुराना
    जहां देशभक्त चढे फांसी, जहां मीरा हुई दिवानी

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Life poem in hindi: एक खत

    होकर परेशान जिंदगी से
    हमने लिखा परमात्मा को एक खत है
    बुला ले अपने पास मुझे
    यहां जमीं पर ठीक नही मेरी हालत है
    जिस घर में हूं रहता
    नींव कमजोर,नाजुक उसकी छत्त है
    जिस घर का हूं मैं मालिक
    वहां कुत्तों सी मेरी कीमत है
    रक्खा भी मुझको इसलिये घर में
    क्योंकि मेरे पास एक मत है
    और कैसे ब्यान करूं अपने दिल का दर्द
    मेरे अपने ही लोग करते मुझ पर हुकुमत है

    घर जो है वो है देश मेरा
    यहां जन्म हुआ था,ये मेरी किस्मत है
    हर उत्सव, हर त्यौहार, हर जश्न
    यहां जिंदगी मेरी ही बदौलत है
    हर तरह से निभा रहा फर्ज अपना
    फिर भी ना जाने क्यूं आई मेरी शामत है
    मेरा सहयोग हर एक बात में जरूरी
    मैंने भी दिया हमेशा अपना शत प्रतिशत है
    पर कोई समझ सके,मेरे दिल की बात
    यहां किसके पास इतना वक्त है
    भारतवासी होना ही अब तो
    मुझको तो लगता एक लानत है

    नोंच कर मांस, मेरा खुन पी रहे
    गिद्धो की कैसी ये दावत है
    चीख रहे चिल्ला रहे, खुन मेरा पीते-पीते
    छोडना नही कुछ भी, मना करना इसकी तो आदत है
    हम मर जाएंगे अगर रक्त ना पिया इसका
    नस-नस में जो बहती, लगी उनको तो वो लत है
    मेरे सारे संसाधनो पर कर कब्जा
    सारी छीनी मेरी दौलत है
    अगर करता अपने हक की बात
    तो कहते, ये क्या गले पडी आफत है
    पहचानते नही मुझको कभी
    अब तो अपने मानव होने पर ही मुझको धत्त है

    कुछ कर पाता नही
    सिर्फ सोचना ही,मेरी फितरत है
    तकलीफ देती जो बार-बार मुझको
    ना जाने वही होती क्यूं हरकत है
    आकर भगवन, तू ही संभाल, मेरे देश को
    बर्बाद हो रही, मेरी सारी मेहनत है
    वरना होकर रहेगा राम नाप सत्य देश का
    अब मुझसे तो देखी जाती नही इसकी गत्त है
    विकास के काम कम हो रहे
    विनाश के सारे रास्ते प्रशस्त है
    खुशहाल जिसका नागरिक नही
    एक दिन जरूर होना उसका सुर्य अस्त है

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Hindi Poem about life : नाश जा लिया

    होया करता जो सब में, वो खास जा लिया
    हकीकत या ए स,इस धरती का नाश जा लिया

    होगी संस्कारां ते या,दिल की जमीन खाली
    बाप बेटे बैठ संग संग,पीवे से अमृत प्याली
    जन्म देन आली माँ की जमा कदर ना रही
    सासू होगी गीता कुरान,माँ ने दे से लाडला गाली
    मिला करता जो रिश्ता में, वो अहसास जा लिया
    हकीकत या ए स,इस धरती का नाश जा लिया

    किसी गहरी खाई में, खो गे म्हारे संस्कार
    रोज सम्बन्धों का खून दर्शाते,भरे चाले अख़बार
    ऊपर ते तो सारे एक दूसरे त मीठा-मीठा बोलै
    पर मौका मिलते ही,भाई प भाई चलावे तलवार
    असलियत या हे स, पहुंच त धना दूर विश्वास जा लिया
    हकीकत या ए स,इस धरती का नाश जा लिया

    दीमक लागी किताब सी,होगी बालकां की शक्ल
    पढ़ना कोई ना चाहता,मारे स सारे नकल बेअक्ल
    पीटे उसने जो समझावे, कहवे घनी बुरी भली
    कहव माँ बाप ने,मत दियो म्हारी जिंदगी में दखल
    जो राखे था,संस्कारां ने जिन्दा,रूह ते वो प्रकाश जा लिया
    हकीकत या ए स,इस धरती का नाश जा लिया

    मतलब के सारे रिश्ते हो गे, मतलब की होगी यारी
    पैदल चालते पाटे कलेजा,सबने चाहिये मोटर लारी
    पीजा, बर्गर,पैटीज,पेस्ट्री,चॉकलेट अडंगा खा के
    जिस्म का भट्टा बिठा लिया,साँस रोन ने होरी म्हारी
    भाज रहें हम सब पाताल में, ख्यालां ते आकाश जा लिया
    हकीकत या ए स,इस धरती का नाश जा लिया

    दुनिया में सबते सुथरे म्हारे संस्कार होया करते
    कदै ना नये बालकां में इतने विकार होया करते
    बात मडी सी लागे,पर स बहुत घनी बड़ी
    वखत था जब म्हारे संस्कार ,जीवन का आधार होया करते
    हर जिस्म में होया करता,वो देवों का निवास जा लिया
    होया करता जो सब में, वो खास जा लिया
    हकीकत या ए स,इस धरती का नाश जा लिया

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

     life Poems Hindi: दर्द का अहसास

    अपनों को अपनों के दर्द का अहसास होना चाहिये
    मुसीबत के वक्त अपनों को अपनों के पास होना चाहिये

    जो पार कर जाये हर बाधा को वही है असली मानव
    देखकर दुखों को कभी ना जिन्दगी में उदास होना चाहिये

    जो मजबूर कर दे खुदा को जमीन पर आने के लिये
    ऐसा भी एक दोस्त जिन्दगी में खास होना चाहिये

    अंधी हसरतें परेशान करती है आदमी को हर कदम पर
    कभी ना इंसान को हसरतों का दास होना चाहिये

    उठती नही बाहें कभी किसी मजबूर बेबस की मदद को
    शाबास हर एक को यूँही जिंदा लाश होना चाहिये

    रक्तदान बचाता है ना जाने कितने लोगों की जिन्दगी
    रक्तदान के लिये हर छह माह में इंसान को बदहवास होना चाहिये

    मेरी वजह से चोट ना पहुंचे कभी भी किसी को भी
    इंसान का सिर्फ और सिर्फ यही प्रयास होना चाहिये

    बना सके हर कोई जरुरतमन्द हमारे हाथों तले आशियाना
    कभी कभी जिन्दगी में आदमी को आकाश होना चाहिये

    फुर्सत के लम्हों में हमेशा याद करो अपने परमात्मा को
    खुदा को भी तो खुदा होने का सदा आभास होना चाहिये

    बना लिया है अब तो बहुत कुछ मानव ने उम्मीद से परे
    खुदा भी चाहने लगा है के अब तो विनाश होना चाहिये

    सुहाती नही यहां अपनों को अपनों की सुहानी सुरत
    इतना ज्यादा भी ना अ नीरज मानवता का नाश होना चाहिये

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Life Poem in  Hindi: खेल जिंदगी का बड़ा अनूठा

    खेल जिंदगी का बड़ा अनूठा
    पता नही कब सांसे दिखा दे अंगूठा
    घोल कर रूह में नफरत की हाला(शराब)
    खुद का ही जिस्म शमशान बना डाला
    बदहवास है सब यूं पैसे के पीछे
    छोड़ता ही नही आदमी कभी लालच का खूंटा
    खेल जिंदगी का बड़ा अनूठा

    संस्कारों के बीज शायद अब जहन में ठीक से बुते नही
    क्योंकि छोटे अब पैर बड़ों के सच्ची श्रद्धा से छूते नही
    कहां से होगा विचारों में संस्कारों का बीजारोपण
    गुरु को चेले अब मारते हैं जूता
    खेल जिंदगी का बड़ा अनूठा

    आधुनिकता के विष में,संस्कार के खेत जल गये
    पता ही ना चला कब,गद्दारी के विचार भीतर पल गये
    रोती रहती मर्यादा कहीं सुनसान में
    बेटा बाप के आगे लगाता नशे का सुटा
    खेल जिंदगी का बड़ा अनूठा

    जाने क्यूं मिटती ही नही,मानव की हवस
    मतलबी रिश्ते सारे,किसी बात में नही रस
    कर रहा अंधाधुंध प्यारी प्रकृति का शोषण
    रहने लगा है अब तो रब भी रूठा रूठा
    खेल जिंदगी का बड़ा अनूठा

    कहते हैं सब खुद को मानव,अ मानव तुझको बधाई है
    पर इस इंसान ने ही,इंसानियत के स्वर्ग में आग लगाई है
    जल रही है धरती,सड़ रही है रूह
    जहरीला हो चुका है हर एक बूटा
    खेल जिंदगी का बड़ा अनूठा

    बचना है अगर तो फिर से अदभुत हरियाली का सब सपना पाल लो
    मर जाएगी धरती,जल्दी से सब इसको सम्भाल लो
    देर मत होने दो प्यारों घर से निकलने में
    वरना निगल जाएगा सब कुछ काल काला कलूटा
    खेल जिंदगी का बड़ा अनूठा
    पता नही कब सांसे दिखा दे अंगूठा

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Hindi Poem on life : अजीबो-गरीब मंजर

    ना जाने कितने अजीबो-गरीब मंजरो से भरी पड़ी है ये दुनिया
    कुछ बातों को सोच सोच कर ही मन घबराता है
    कोई ह्रदय को चीरने वाला मजर देखकर, एक पल तो दुखी होता है दिल
    अगले ही क्षण कोई नया किस्सा देखकर खुश भी हो जाता है

    होता है जन्म जब बेटे का
    सबसे ज्यादा खुशी से एक बाप चिल्लाता है
    होता है जब वही सपूत बड़ा
    फिर वही बाप गिड़-गिड़ाता है

    मदमस्त चंचल कोई बालक होता है जब अपनी मस्ती में
    खुद तो झुमता है मस्ती मे साथ मेें अपनी मां को नचाता है
    छुप छुप कर इधर उधर खेलता आंख-मिचौली
    अनजाने में ही सही पर घर के कोने कोने को महकाता है

    कर के देख लो चाहे किसी पर भी भरोसा जरूरत से ज्यादा
    यहाँ दोस्त ही अपने दोस्त की नैया डुबाता है
    हो जाती है यहां छोटी छोटी बेमतलब की बातो को लेकर सगे भाइयों में लड़ाई
    फिर तो सगा ही सगे के रास्ते मे जाल बिछाता है

    पाकर कोई खुशखबरी
    यहां मस्त होकर जब कोई गुनग्नता है
    बोलना तो बेचारें के बस में नही होता
    अजीब अजीब हरकते करके सबको हसांता है

    दिल टुटता है, लगता है उसे एक झटका
    जब गरीब किसी अमीर के आगे अपने हक के लिये हकलाता है
    अरे जिसके पास पैसे रखने की जगह नही वंही सबसे कठोर है यहां
    एक दिन वही अमीर उसी पैसे की सोच में, चुपचाप रात के अंधेरे में मर जाता है

    देखकर लंबी आलीशान गाडी किसी रईस की
    गरीब का बच्चा जोर जोर से खिल-खिलाता है
    जिनको पीने का पानी भी नसीब ना होता
    कई कई दिनो तक उन पर करके दया,फिर उनको सावन खुद नहलाता है

    कुछ को नसीब ना होती एक वक्त की भी रोटी
    वही अमीर यहां बिना जरूरत के भी खाता है
    आज तक समझ न आया मुझे
    क्युं बेवजह इसांन खुद पर इतना इठलाता है
    जरा सी भी चोट ना बर्दाशत होती उससे
    रोज नए नए बहाने से भगवान इंसान को समझाता है

    ध्यान से सुनो अ दुनियावालो
    अमीर गरीब के बीच बढती जा रही है खाई
    यह ज्ञान की बात तो हर एक ज्ञानी बताता है
    पर मौका मिलता है तो भगवान बगैर आवाज किये
    वह सबसे पहले जालिम बेदर्दी पैसे वाले को अपने पास वापस बुलाता है ।

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Hindi Poems For Life: जिन्दगी सिखाती है | jindagi sikhati hai

    अजीब दास्तान है इस जिन्दगी की
    ना जाने कितने मौको पर तकदीर बेवजह रूलाती है
    जिसकी कभी कल्पना भी ना की हो जीवन में
    ऐसे ऐसे अनोखे मंजर भी दिखाती है

    जो कल तक हंसती थी जोर जोर से सांसे
    वही आज सामने देखकर दुखो को कराहती है
    जिसने कभी भी गलत ना किया किसी के भी साथ
    उसके आंगन में भी आफतो की बारिश आ जाती है

    जिन्दगी अजीब चीज है करके परेशान किसी को बेवजह
    फिर दूर खड़ी खड़ी मुस्काती है
    लूट कर किसी बेकसूर का सब कुछ
    कभी भी ना अपने कामों पर पछताती है

    सोचता रहता इंसान मजबूर होकर
    क्या जिन्दगी सबसे साथ यूं ही निभाती है
    देकर सबको थोड़ा या ज्यादा कष्ट
    सबको जिन्दगी का असली मतलब समझाती है

    रोना पड़ता है हंसते खेलते इंसानो को भी
    जब जिन्दगी गमों की दुनियां से परदा हटाती है
    दुख सुख मिलकर ही करते एक अदद जीवन का निर्माण
    शायद ऐसा करके हर माहौल में जीना सिखाती है

    जो सह जाता हर गम को हंसकर
    फिर उसके जीवन में सदा बहारे ही बहारे आती हैं
    छू भी ना पाता कोई गम उसके दामन को
    फिर तो जिन्दगी इंसान को इतना ऊपर उठाती है

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Hindi Poems about Life : लाईव जिंदगी | Live Zindagi

    कैसे गुजारनी है जिंदगी कैसे जीवन बसर करना है
    बेरहम धक्के सब कुछ सिखा देते हैं
    चाहे कितनी मर्जी ऐशो आराम में गुजरी हो किसी की जिंदगी
    पर तकलीफ के चंद लम्हे ही जालिम जिंदगी की हकीकत बता देते है ||

    गरीब होना सबसे बड़ा अभिशाप है जमीन पर
    ना चाहते हुए भी जो जहर पिला देते है
    चंद झटके नुकसान के ढाते है सितम बहुत
    जो विशालकाय हाथियों के पैरों को भी हिला देते है ||

    कुछ लम्हे हसीन अगर जिंदगी को मिल जाए
    तो वे बड़े से बड़े गम को भुला देते है
    मिल जाए अगर मन मांगी दुआ यहां किसी को
    फिर तो सपने, हकीकत में अपनी गोदी में सुला लेते है ||

    अचानक आया हुआ रूपया पैसा, धन दौलत ऐशो आराम
    गरीब से गरीब इंसान पर भी एक अजब सा नशा चढ़ा देते है
    जब यही गरीब अंधे होते है उसी दौलत की चकाचौंध में
    फिर तो अपने ही अपनों को एक एक पैसे की खातिर यहां रूला देते है ||

    अचानक आई हुई कोई मजबूरी आफत
    पहाड़ जैसे दिल वाले इंसानो की भी सांसे फुला देती है
    और आता है जब कभी ऊपरवाला अपनी पर
    तो अच्छे भले स्वस्थ इंसान को भी जमीन से उठा देते है ||

    चंद छोटे छोटे लम्हों से बनी है सबकी जिंदगी
    कुछ पल इंसान को हंसा देते है और अगले ही कुछ पल रूला भी देते है
    जो ईमानदारी से निभाता है अपना मनुष्य होने का धर्म
    सिर्फ उसी को तकदीर के देवता अच्छा सिला देते है ||

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Hindi Poem on life : अलबेली जिंदगानी

    सुख-दुख, खुशी-गम नाम की उफनती दरिया को फांद कर
    जिंदगी के उस पार उतरना पड़ेगा
    हंसकर करो चाहे, रोक कर करो
    ये सफर तो पार करना पड़ेगा ||

    नही छोड़ना है हौसलां देखकर मुसिबतों को सामने
    कुछ देर ही सही पर आगे तो अड़ना पड़ेगा
    वरना खा जाएगी मौत, जिंदगी को पल भर में
    बहुत तड़फ तड़फ कर, ना चाहते हुए भी मरना पड़ेगा ||

    खाकर जिंदगी के धक्के नही संभले तो क्या फायदा होगा
    जीने के लिये सबसे पहले यहां निखरना पड़ेगा
    वरना पटक देगी ये जालिम जिंदगी नीचे
    ना चाहते हुए भी फिर बिखरना पड़ेगा ||

    नही मिलती हर बार आसान राहें यहां
    कई बार मुश्किल दौर से भी गुजरना पड़ेगा
    लाख ठीक हो तुम अपने उसुलो के अ दोस्त
    पर यहां तो फिर भी सुधरना पड़ेगा ||

    रोकना पड़ेगा मन की इच्छाओं को जबरदस्ती
    कई बार मन की लालसा से मुकरना पड़ेगा
    हर बार मौसम ठीक नही होता उड़ने की खातिर
    क्या करोगे, अपनी ही परों को कुतरना होगा ||

    जीना है अगर औरों से ज्यादा यहां
    तो गरीबों से मजबूरन इश्क भी करना पड़ेगा
    गलती से भी बददुआ मत ले बैठना किसी की यारों
    वरना हर पल बाकी जिंदगी उस बात का हर्जाना भुगतना पड़ेगा ||

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

    Read More Hindi Poems:

    टिप्पणी पोस्ट करें

    3 टिप्पणियां

    1. मेरे फटे हुए सपनों को मेरी माँ सी रही थी।
      जानती थी इसे जरूरत है पैसो की इसिलए
      वंद कमरे वो मेरे बाप को अपने गहने दे रही थी।
      मेरे फटे.... सपनो को मेरी माँ सी रही थी......

      https://rkrajputhindi.blogspot.com/

      जवाब देंहटाएं

    Disclaimer

    The contents on this website can be read and shared for personal entertainment purposes only. If you want to republish this work in a commercial setting, please contact the author. All the images, Poems, Quotes, Slogans, Thoughts, Vichar in Hindi and blogs are subject to copyright. Viewers are free to share the content on their social media but all rights are reserved by Hindi Suvichar. In case of any dispute after sharing, the person sharing the content will be solely responsible for any damages. The author does not take responsibility once the content is shared through social media.