10+ Heart Touching Poem on Daughters | Poems for Betiyan | बेटियों पर कविताएँ

Best Hindi Poem on Daughters: बेटा और बेटी दोनों एक समान है । कन्या हत्या को रोकर इसकी शुरुआत करनी होगी और बेटी की शिक्षा की समुचित व्यवस्था करनी होगी । दरअसल हर बेटी जब शिक्षित होगी तब ही, ये धरती जन्नत होगी । यहाँ समाज निर्माण में अक्षुण्य और अतुलनीय योगदान देने वाली लड़की को बचाने के लिए दिल को छूने वाली Neeraj Bansal की बेटियों पर कविताएँ .....

10 + Best Hindi Poem on Daughters | Poems For Betiyan in Hindi | Beti Bachao Beti Padhao par Kavita | बेटियों पर कविताएँ



    poem on Daughter in hindi

    Short Lovely Poem On Betiyan Hindi: बेटियाँ एक अहसास

    एक अहसास का नाम बेटी है
    एक विश्वास का नाम बेटी है ||
    क्या बताऊँ, क्या है कीमत बेटी की
    हर एक सांस का नाम बेटी है ||
    परमात्मा की तरह अदभुत महान होती हैं
    बेटियां सचमुच खुशियों का रोशनदान होती है ||
    क्या होता है जीवन, क्या होती है सांसे, बातें प्यारी प्यारी कैसे सुनोगे
    जब बेटियां ही न होगी धरा पर, तो बताओ किलकारी कैसे सुनोगे ||
    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'


    Beti Bachao Beti Padhao Par Kavita: मैं आशियाना ढूंढती हूँ

    जीने का बहाना ढूंढती हूँ
    मैं घर में ही आशियाना ढूंढती हूँ
    कद्र करे जो मेरी दिल से सच्ची
    आज तक मैं वो जमाना ढूंढती हूँ

    मुझसे ही है,धरा पर मौसम बहारों का
    बिन मेरे कोई मजा नही,जहां में नजारों का
    वैसे तो हूँ में खुद ही तरन्नुम
    पर गुनगुनाने को कोई तराना ढूंढती हूँ
    जीने का बहाना ढूंढती हूँ

    मेरी वजह से ही धरा पर,ये अनोखा जीवन है
    मैं भी लूं आनंद जिंदगी का,चंचल मेरा भी मन है
    बांटती हूँ में हर रूह को प्राणों की रोशनी
    पर खुद में ही खुशियों का खजाना ढूंढती हूँ
    जीने का बहाना ढूंढती हूँ

    मत समझो अ जमाने वालों मुझको तुम काला टीका
    बिन मेरे तो रह जाता,हर एक तीज त्यौहार फीका
    मैं ही लिखती सारे जग की कहानी
    पर मैं जग में खुद का फसाना ढूंढती हूँ
    जीने का बहाना ढूंढती हूँ

    दर्द हो चाहे कितना दिल में,मैं गीत चाहतों के गाती हूँ
    नन्ही मासूम प्यारी कली सी,मैं हर आँगन में मुस्काती हूँ
    करती हूँ जैसे में परवाह अपने प्यारों की
    कोई करे मेरी ऐसी,वो दीवाना ढूंढती हूँ
    जीने का बहाना ढूंढती हूँ
    मैं घर में ही आशियाना ढूंढती हूँ
    कद्र करे जो मेरी दिल से सच्ची
    आज तक मैं वो जमाना ढूंढती हूँ

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'


    Beti Bachao Beti Padhao par Kavita | बेटी बचाओं, बेटी पढ़ाओ

    कन्या भूर्ण

    मासूम जीवन धरा पर जन्म लेने को तरस रहा है
    पर मानव का स्वार्थी कोडा उस पर बरस रहा है

    जीवन, जीवन को ही बेरहमी से कोख में मार रहा है
    अ मानव ये कैसा तू अपना भविष्य सुधार रहा है

    जीवन कन्या रूप में अब कोख में आने से डरने लगा है
    मुर्ख स्वार्थी आदमी कोख में सोचकर कन्या आहें भरने लगा है

    जीवन के निर्माण की ये घटना कन्या जन्म के रूप में सबको चुभती है
    बता दे अ बेदर्द जमाने, कन्या भुर्ण में मेरी क्या गलती है, ये कन्या भुर्ण पूछती है||

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'


    Beti Bachao Beti Padhao par Kavita | बेटी बचाओं, बेटी पढ़ाओ

    कन्या भूर्ण-2

    जन्म लेने से पहले ही ये कैसा मेरा जीवन संवार दिया
    माँ ने घर वालों से तंग होकर मुझे मौत के घाट उतार दिया

    जानता है सारा जग के बिन कन्या कभी ना धरा पर सरती है
    फिर भी लाखों देवियां माँ की कोख में जबरदस्ती मरती है

    पूजा पाठ के वक़्त कहता आदमी के हे माँ बस मेरी रक्षक तू है
    पर असल जीवन में तो नारी सिर्फ जरूरतें पूरी करने की वस्तु है

    इस आधुनिक युग में भी सबसे ज्यादा परेशान नारी है
    सिर्फ कहने को ही बेटियां इस जमाने को दिल से प्यारी है

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'


    Poem on Save Girl Child: तमन्ना

    कभी तो देते हैं नाम तमन्ना
    कभी जन्म देने से भी करते मना
    मानो या ना मानो लोगों इसे
    पर भावनाएं मर चुकी है हमारी
    अरे ये बेटियां नही है, ये तो है अदभुत फुलवारी

    क्यूँ इस कदर हमारी इच्छाएं जली है
    क्यूँ ताने सहते सहते अनमोल बेटियां पली है
    समझो इन अनोखी क्यारियों का महत्व
    आश्रित है इन पर ही सृष्टी सारी
    अरे ये बेटियां नही है, ये तो है अदभुत फुलवारी

    देख कर इन्हें धरा पर भगवान हंसता है
    इनके रूप में हर देव जमीं पर बसता है
    सबको मालूम है के इनके बिन गुजारा नही
    फिर भी क्यूँ जानबूझ कर दिखाते है हम लाचारी
    अरे ये बेटियां नही है ये तो है अदभुत फुलवारी

    जानबूझ कर करते है हम सब ये भेदभाव
    अरे इनसे बढकर नही कोई सुनहरी छाव
    दिल से समझो जरा इस बात का महत्व
    कैसे गूंजेगी कन्या बिन धरा पर किलकारी
    अरे ये बेटियां नही है ये तो है अदभुत फुलवारी

    पीछे हटो,होने दो धरा पर थोडा इनका अधिकार
    ख़ुशी ख़ुशी करो लोगों इनके गुणों को स्वीकार
    कोई ज्यादा फर्क नही है आज लड़का लडकी मैं
    सच यही है के जमीन को जन्नत बनाती है नारी
    अरे ये बेटियां नही है ये तो है अदभुत फुलवारी

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'


    Beti par Kavita in Hindi: दुःख को भुलाती है बेटियां

    बड़े से बड़े दुःख को पल में भुलाती है बेटियां
    हर दुःख दर्द में माँ बाप का साथ निभाती है बेटियां

    बात बात पर रुलाता है वही बेदर्द जमाना उसको
    जिस जमाने को मरते दम तक हंसाती है बेटियां

    हर हाल में सहन करना है जिन्दगी के थपेडों को
    सब्र से जिन्दगी जीने का सबब बताती है बेटियां

    होता है जमीन पर ही जन्नत का अदभुत अहसास
    जब अपने पावन हाथों से खिलाती है बेटियां

    सांसे अटकी रहती है तब तक,जब तक लौटती नही
    पिता कहता,क्यूँ घर से बहुत दूर अकेली जाती है बेटियां

    दूर रहकर भी रहूंगी सदा मैं नजदीक तेरे
    बाबुल को विदाई से पहले समझाती है बेटियां

    हो जाता है घर के कोने कोने में सुनहरा उजाला
    जब भी खुश होकर दिल से खिलखिलाती है बेटियां

    देखता है जब भी कोई अपना पराया बुरी नजर से
    तन्हाइयों में चुपचाप अकसर करहाती है बेटियां

    आता है जब जिगर में हौसलों का भयंकर तूफान
    तो पल में झाँसी की रानी बन जाती है बेटियां

    क्या कहूँ मैं नीरज बेटियों की तारीफ में अब
    हकीकत यही है के जमीन को जन्नत बनाती है बेटियां

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'


    Beti par Kavita in Hindi: मेरी भी सुनो

    गीत जीवन का गुनगुनाना चाहती हूँ, मैं भी इस धरा पर आना चाहती हूँ
    मत मारों अ माँ मुझको तुम कोख में, मैं भी धरा पर जीवन सजाना चाहती हूँ

    सुन माँ, बेटियों की वजह से ही हर आँगन में किलकारी है
    जो बोती धरा पर जीवन बेटियां तो वो अदभुत फुलवारी है
    देख ले अ बेदर्द जमाने तू भी अपने चारों तरफ
    लड़कियां अब लड़कों से कम नही, हर एक क्षेत्र में भारी है
    मुझसे ही जीवन है धरा पर अ माँ, सबको ये समझाना चाहती हूं
    गीत जीवन का गुनगुनाना चाहती हूँ, मैं भी इस धरा पर आना चाहती हूँ

    मुझको क्यूं मारती है तू,मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है
    शायद ही किसी भूर्ण ने कभी किसी का घर उजाड़ा है
    आकर धरा पर मैं भी स्वाभिमान,नवसोच का निर्माण करूंगी
    देश विदेश तक अ माँ मैं तेरे घर आँगन की पहचान करूंगी
    लडकिया नही होती बोझ माँ बाप पर, सबको ये बताना चाहती हूँ
    गीत जीवन का गुनगुनाना चाहती हूँ, मैं भी इस धरा पर आना चाहती हूँ

    क्या होगा ऐसे गंदे समाज का अ खुदा, जिसको अजन्मा बच्चा भी अखरता है
    जो देखा ही नही अभी तक भविष्य, ना जाने क्यूं उसे सोच सोच कर इंसान डरता है
    सारा दिन करता है बाजारों में जो आदमी इंसानियत की बातें
    वो भी सौ जन्मों तक माफ ना होने वालें भूर्ण हत्या जैसे अपराध करता है
    खुद भी हँसना और सबको हँसाना चाहती हूँ
    गीत जीवन का गुनगुनाना चाहती हूँ, मैं भी इस धरा पर आना चाहती हूँ

    अ माता,जब मार दोंगे जीवन को कोख में ,तो कैसे ये संसार चलेगा
    समझ लो एक कन्या के जन्म से ही,धरा से जीवन का विनाश टलेगा
    और हर एक साँस अपनी अलग किस्मत लेकर आती है जहान में
    आदमी के चाहने से नही परमात्मा के चाहने से हर बालक पलेगा
    मैं भी बनकर खुशबू अजब
    जीवन गुलशन को महकाना चाहती हूँ
    गीत जीवन का गुनगुनाना चाहती हूँ
    मैं भी इस धरा पर आना चाहती हूँ
    मत मारों अ माँ मुझको तुम कोख में
    मैं भी धरा पर जीवन सजाना चाहती हूँ

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'


    Betiyan Kavita in Hindi: दुःख दर्द क्या है ये भूलना चाहती हूँ

    दुःख दर्द क्या है ये भूलना चाहती हूँ
    मैं भी माँ तेरे बाँहों के झूले में झूलना चाहती हूँ
    मत बांधो रिवाजों की बेड़ियाँ मेरे पांव में
    मैं भी मस्त सुगंध सी,हवाओं में घुलना चाहती हूँ

    चप्पे चप्पे पर जमीं के,मेरा भी अधिकार है
    हर जीवन जमीं का,मेरा ही दिया आकार है
    जीवन की जरूरत हूँ मैं,किसी पर बोझ नही हूँ
    बजते मेरे भी व्याकुल मन में,उमंगो के सितार हैं
    पिंजरे में मैं और नही रह सकती
    आजाद पंछियों की तरह मैं भी अब तो उड़ना चाहती हूँ
    दुःख दर्द क्या है ये भूलना चाहती हूँ

    सिर्फ कहने को ही बेटियाँ,मासूम नन्ही परी है
    पर हर साँस मेरी सहमी सहमी, डरी डरी है
    सिर्फ अपने भरोसे पर मैं हूँ जिंदा जमीं पर
    संभालो मुझे मेरी सबसे ये विनती आखरी है
    जो बाँटती है हर ओर मुस्कान
    मैं उस मस्त बहार सी फलना फूलना चाहती हूँ
    दुःख दर्द क्या है ये भूलना चाहती हूँ

    हार भी मैं हूँ जीत भी मैं हूँ
    गीत भी मैं हूँ,संगीत भी मैं हूँ
    समझो मेरी कद्र कभी तो
    जीवन भी मैं हूँ,प्रीत भी मैं हूँ
    बहुत हो चुके मुझ पर सितम
    पर अब तो मैं बेटों से अपनी तुलना चाहती हूँ
    दुःख दर्द क्या है ये भूलना चाहती हूँ
    मैं भी माँ तेरे बाँहों के झूले में झूलना चाहती हूँ
    मत बांधो रिवाजों की बेड़ियाँ मेरे पांव में
    मैं भी मस्त सुगंध सी,हवाओं में घुलना चाहती हूँ

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'


    Betiyan Kavita in Hindi: Jeevan ki Pukar

    फरिश्ते, देव, अल्लाह,खुदा, रब, परमात्मा सबकी रूह में शूल चुभोती है
    सुनाकर अपनी हत्या की कहानी,कन्या भुर्ण देवों के आगे चीख चीख कर रोती है ||

    क्या होता है जीवन, ये अभी अभी अहसास होना शुरू हुआ था
    क्या बताऊं में तुझको जमाने, मेरे शरीर का विकास होना शुरू हुआ था ||

    पाकर माँ की कोख का सुखद अहसास, हर ओर अपने देखने लगी थी मैं
    कैसा होगा ये अदभुत जीवन चमन,रोज नये सपने देखने लगी थी मैं ||

    बहुत अरमान थे दिल में के मैं भी धरा पर अनमोल जीवन को सजाऊंगी
    मैं भी कोमल मासूम तितली की तरह कभी इस डाल, कभी उस डाल गुनगुनाउंगी ||

    कब माँ प्यार से पुचकारेगी, हर वक़्त मुझे ममता की प्यास लगी रहती थी
    कोख में लड़का है या लड़की पर घर में तो हर वक़्त ये बकवास लगी रहती थी ||

    रोज नई उमंग थी चित्त में, के धरा पर मेरे आगमन की पूरी तैयारी है
    मुझे क्या पता था के घरवालों का तो एक एक पल मेरे जन्म को लेकर भारी है ||

    घर में रोज कलह होती,पहले ही दो है, तू तीसरी को कैसे संभालेगी
    महंगाई,वहशीपन के इस दौर में तू तीन तीन लड़कियों को कैसे पालेगी ||

    कैसे चलेगा बिन लड़के के इस भरे पुरे खानदानी परिवार का वंश
    देकर तुझको अ माँ रोज ताने, यूं हंसते सभी जैसे कभी हंसता था कंश ||

    घरवालों की रोज रोज की बातों से में तो कोख में ही डरने लगी थी
    घर वालों के मारने से पहले ही ,मैं जिन्दा लाKश, कोख में ही मरने लगी थी ||

    जब तक पता ना था कोख में कन्या है, तूने भी अ माँ मुझे जी भरकर प्यार दिया
    पता चलते ही के मैं कन्या भुर्ण हूँ, तूने घर वालों से तंग होकर मुझे बेरहमी से मार दिया ||

    मानती हूँ, जानती हूँ मैं, के मेरी हत्या के वक़्त अ माँ तेरी भावना एक ना चली
    पर किसी ने सोचा भी नही, कब धरा पर आकर बताओ कोई बेटी ना पली ||

    खुद की गलती का सारा पिटारा मुझ मासूम,निर्दोष के सिर पर थोप दिया
    किसी जालिम, बेरहम, हैवान डॉक्टर ने चन्द पैंसों के लालच में मेरे कोमल जिस्म में छूरा घोप दिया ||

    क्या इसी को कहते हैं मानवता, ये बात अब मेरी भटकती रूह को रोज खलती है
    सबकुछ माना ठीक किया, पर ये तो बता दो के कन्या भुर्ण बनने में मेरी क्या गलती है ||

    मानव हूँ में, मानव द्वारा, अमानवीयता से की गई,अपनी हत्या स्वीकार करती हूँ
    ले लुंगी किसी रोज, किसी ना किसी रूप में हत्या का बदला,खुद को तैयार करती हूँ ||

    हकीकत है,उस अभागे घर की लाखों पीढियां जानवरों की योनि में होती है
    जहां जहां जिस जिस आंगन में कन्या भुर्ण की बेदर्दी से हत्या होती है ||

    सुन ले तू भी अ बेदर्द जमाने,कन्या ही देती है इस निर्जीव धरा को आकार
    मत मारों जीवन को बेरहमी से कोख में, वरना धरा पर हो जायेगी हाहाकार ||

    सोचकर लड़कियों संग जमाने का व्यवहार मुझ'पत्थर' की भी आँखे नम है
    ध्यान से देख अ जमाने अपने चारों तरफ,बता लड़कियां लड़कों से कहां कम हैै ||

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'


    Poem For Betiyan Hindi: Meri bitiya

    समझ ना पाती बातें फिर भी रखकर माथे पर हाथ झल्लाती है
    देखकर कोई परी सपने में सोते सोते भी वो मुस्काती है ||

    जब रो पड़ती किसी अनजाने डर से, महसूस होता जैसे कोई कली कुम्हलाती है
    देखकर खिलौने बाजार में जोर से पापा पापा चिल्लाती है ||

    देखकर उसका रूप सलोना आँखे मेरी भर आती है
    पा जाता मैं तो जन्नत जमीन पर, जब मेरी बिटिया मेरी गोदी में सो जाती है ||

    होकर मस्त किसी संगीत पर,जब अपने संग नचाती है
    करके चंचल हरकतें , जब सबको वो सताती है ||

    बनाकर अजीबो गरीब शक्लें, जब सारे परिवार को वो हंसाती है
    अपने तोतले बोलों से जब गाना कोई सुनाती है ||

    चिपक कर मुझसे मेरी छाती पर जब सारी सारी रात बिताती है
    पा जाता मैं तो जन्नत जमीन पर, जब मेरी लाडो मेरी गोदी में सो जाती है ||

    अपने नन्हे हाथों से जब मुझको वो खिलाती है
    मासूम बड़ी लगती है जब किसी खिलौने को पानी वो पिलाती है ||

    ले जाती बीते दौर में वापस, मेरी माँ की याद वो दिलाती है
    उसकी छोटी छोटी हरकतें, जमीन को स्वर्ग से मिलाती है ||

    याद आ जाता खुद का बचपन, जब गुस्से में मुझ पर हाथ वो उठाती है
    पा जाता मैं तो जन्नत जमीन पर ,जब मेरी गुड़िया मेरी गोदी में सो जाती है ||

    गिरकर जमीन पर धड़ाम से, जब अपने पैरों को वो सहलाती है
    खुश होकर जब वह अपनी पायल नई बजाती है ||

    होकर नाराज किसी बात पर, जब नकली गुस्से में वो इठलाती है
    ओढ़कर अपनी माँ की चुनरी, जब सलीके से वो शर्माती है ||

    थककर जब भी घर आता हूँ मैं, मुझको अपने कंधे पर वो सुलाती है
    पा जाता मैं तो जन्नत जमीन पर, जब मेरी किस्मत मेरी गोदी में सो जाती है ||

    कहने को कोई बात जब अपने करीब बुलाती है
    किसी चहेती चीज को, जब मुझसे वो छुपाती है ||

    ना कह पाने की स्थिति में, जब बोलते बोलते वो हकलाती है
    पहनकर कोई पोशाक नई, जब खुद पर ही वो इतराती है ||

    खाकर डांट किसी शरारत पर, जब आँखों से आंसू वो बहाती है
    पा जाता मैं तो जन्नत जमीन पर, जब मेरी जिंदगी मेरी गोदी में सो जाती है ||

    अपने घर अपनी किसी सहेली को वो लाती है
    अपने सारे खिलौने अपनी सारी चीजें दिखलाती है ||

    महसूस होता जैसे ले रही हो विदाई, जब भी घर से बाहर वो जाती है
    चिंता सताती रहती उसकी, जब भी आने में देर उसे हो जाती है ||

    होता पुरे दिन में वही स्वर्णिम पल मेरी, जो मेरी परी मेरे संग बिताती है
    पा जाता मैं तो जन्नत जमीन पर, जब मेरी बिटिया मेरी गोदी में सो जाती है ||

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'


    Poem For Betiyan Hindi

    समझते है सभी बेटे को ही नेक
    वंश चलाना चाहता है यहां हर एक
    रो पड़ते है अच्छे अच्छे बच्ची को जन्म देने के नाम पर
    क्या हो गई धरती की सुरत मेरे मौला,

    कोई तबाही का सामान तू ही ऊपर से फैंक
    खुद खुदा ने बनाकर अपने हाथों से भेजा है जमीन पर एक खिलौना
    एक ही घर में खुशबू नही फैलाती कई घरों का एक साथ महकाती है कोना-कोना
    बिना लड़की भूल जाओ लोगों धरती पर जीवन का आस्तित्व
    हो जाए अगर दो से भी ज्यादा तो भी कभी मत रोना

    मारकर बेकसूर बच्चियों को बताओ क्या हासिल करोंगे
    खुद को ही खुद के भविष्य का कातिल करोगे
    कोई तोहफा, उपहार, सम्मान नही मिलता ऐसा करने पर
    खुद को ही दरिंदो की दुनिया में शामिल करोगे

    क्यूं लहलाती अधपकी फसल को काट रहे हो
    क्यूं सुंदर फूलों को गंदगी में डालकर कांटे अपनी खातिर छांट रहे हो
    बंद करो ये खौफनाक घिनौनी हरकतें आज अभी से
    घोटकर गला जिंदगानी का क्यूं हर तरफ मौत बांट रहे हो
    अरे कन्या तो एक ऐसा अदभुत अनोखा गुलशन है

    पतझड़ के मौसमों में भी जिसमें खुशबू रहती हरदम है
    मत उजाडो अपने हाथों ही अपने भविष्य को लोगों
    लड़कियां अब बोझ नही रही देखो चारो तरफ,कहां लड़कियां अब लड़कों से कम है
    सबको मिलकर इस कुकर्म से सख्ती से निपटना होगा
    खुद बुर्जगों को लड़कियां बचाने के लिये मां की कोख से लिपटना होगा

    अरे हमने भी तो कभी ऐसी किसी पवित्र कोख से जन्म लिया था
    सबको मिलकर जमीन की इस जन्नत का महत्व समझना होगा
    दूसरे को मारने से पहले जरा खुद भी कभी खाकर देखो जहर
    क्यूं मानवता के दुश्मन बनकर, अपने ही घरों में मचाते हो कहर
    अगर बंद आज अभी से नही करोगे ये लड़का लड़की वाला अन्धविश्वास
    तो किसी दिन सिर्फ लड़को से भरकर रह जाएंगे सारे गांव शहर

    नीरज रतन बंसल 'पत्थर'

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